साक्षात्कार | हास्य कवि हरीश चतुर्वेदी

प्रश्न.१. - आपको हास्य कवि बनने की प्रेरणा कहा से मिली ?

उत्तर – विसंगतियों से। जीवन में जो विसंगतियां फैली हुई है, वही से हास्य निकलता है। हास्य का जन्म तकलीफ से होता है। हंसी हमेशा विसंगति से पैदा होती है। और यह जीवन का सत्य है। जिस पर एक मनुष्य तकलीफ में आया है, या जिस पर आप व्यंग्य कर रहे है, तो बाकी लोग हंस रहे है। जरा सि बात कह देने से हास्य पीड़ा नहीं होता। असाधारण है हास्य। उसे खोजना भी असाधारण है, उसके लिए द्रिष्टि होनी चाहिए। मनुष्य को रुलाना बहुत आसान है, मगर हास्य एक कला है।

प्रश्न.२. - क्या आपने कभी अपने साहित्यिक उपनाम के बारे में सोचा है ?

उत्तर - नहीं। मैंने कभी उपनाम का प्रयोग नहीं किया , और उपनाम का मुझे कोई उपयोग भी नहीं लगा। मेरा मानना है की , अगर मैं अपने नाम से ही जीवित नहीं रह सकता , तो उपनाम से क्या जीवित रहूँगा ! जो मेरा नाम है, वो ही मेरी पहचान है। आप बताये की प्रभु लाल गर्ग को कौन जानता है? लेकिन काका हतृषि को सब जानते है, मगर कोई यह नहीं जानता की काका हतृषि ही प्रभु लाल गर्ग जी है। तो आपको अपने नाम पर भरोसा होना चाहिए। जो आपका नाम है, वो ही आपको प्रसिद्धि दिलाएगा।

प्रश्न.३. - जब आपने सर्वप्रथम अपनी कविता प्रस्तुत की तो आपकी क्या प्रतिक्रिया थी?

उत्तर - वो प्रतिक्रिया ही हमारे कवि बनने का कारण है। अगर उस समय हमें अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो शायद हम आगे नहीं बढ़ पाते। उत्सव है ना प्रोत्साहन। जो प्रतिक्रिया सबसे पहले बार मिली, वो ही लम्बी यात्रा का कारण है। अगर अच्छी प्रतिक्रिया ही नहीं मिलती, तो आगे बढ़ना कठिन होता।

प्रश्न.४. - वर्तमान भारत में हिंदी साहित्य की स्थिति पर आपका क्या विचार है?

उत्तर - साहित्य तो कभी भी कम नहीं रहा है। साहित्यकार भी कभी कम नहीं रहे है बस यह है की अभी यह विद्योक्ताओ का दौर है। अन्यथा साहित्य तो अभी भी बहुत अच्छा देखा जा रहा है लेकिन आज सभी साहित्यकार प्रकाशित नहीं हो रहे है। काम तो कभी भी नहीं रुका। कई न कई भाग्य भी साथ देना चाहिए। कर्म तो मनुष्य को करना ही चाहिए।

प्रश्न.५. - आपको हमारा कॉलेज कैसा लगा?

उत्तर - कॉलेज तो अभी पूरी तरह से देखा नहीं। अभी तो रात्रि में मैं सीधा रूम में आ बैठ गया। कवि सम्मेलन में जनता कैसी है, उससे कॉलेज की प्रतिमा की जानकारी मिलती है। यह जनता की ज़िम्मेदारी है की वह अच्छी बात पर दाथ दे ताकि कवि को भी प्रोत्साहन मिले।