साक्षात्कार श्री बलराम श्रीवास्तव

Q. आपने पहली बार काव्य रचना कब करी? व उन पंक्तियों का प्रेरणा स्तोत्र क्या रहा?

सन '87 की बात है, मैं तब B.Sc. - I का छात्र था । पंजाब में खालिस्तान की मांग पर दंगे चल रहे थे । तब एक कविता लिखी थी, समय की बहे यही पुकार । वार्षिकोत्सव में पढ़ी तो प्रथम पुरस्कार मिला, यूनिवर्सिटी लेवल पे द्वितीय । 

काफी आक्रोश था उन पंक्तियोन में, जो कि मेरा स्वाभाविक रूप नहीं है । आगे चलके मैंने श्रृंगार को अपनी धारा बनाया व सामाजिक संदर्भों के गीत भी लिखे ।

 

Q. आप पहले शिक्षक रह चुके हैं, अब आप प्रधानाचार्य हैं, साथ ही कवि और गीतकार भी । यह पूरा सफर ज़रूर ही रोचक रहा होगा । कुछ ऐसी सीख पाई हो आपने, कुछ ऐसा अनुभव रहा हो जो आप हमारे साथ साझा करना चाहें ?

लोग अक्सर ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ की विचारधारा का समर्थन करते हैं । मैं इसका पक्षधर नहीं हूँ । मेरी मानें तो ‘शाही जीवन, उच्च विचार’ की सीख देनी चाहिए । सम्पन्नता, संप्रभुता, आधुनिकता और संस्कृति सब उसमें समाहित हो सकती हैं । जीवन में संतोष हो, लेकिन ठहराव नहीं ।


 

Q. आपने जब पहली बार मंच संभाला तब आपके मनोभाव क्या रहे?

मनोभाव सदा ही सकारात्मक रहे, आत्मविश्वास था ।

Q. कुछ संदेह? कुछ शंकाएँ?

कभी कभी लगता था कि हँसी के पात्र न बन जाएं, लेकिन सब सही ही हुआ । मैं विज्ञान का छात्र रहा हूँ, MSc के बाद कैसे इंटरमीडिएट तक पढ़ी हिंदी ने काव्य को आजीविका बना दिया, मालूम नही ।

 

Q. वर्तमान में कविताओं को सुनने सुनाने का चलन कम हुआ है । वे केवल स्कूली पाठयक्रम तक सीमित रह गयी हैं । इसके उपलक्ष्य में आप युवा पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहेंगे?

सरल व प्रभावी कार्यप्रणाली तो यही होगी कि आगामी पीढ़ी को काव्य के लालित्य से अवगत कराएं । उसके लिए हर शैक्षिक संस्थान में वार्षिक साहित्यिक समारोह आयोजित हो, जिसमें कवि सम्मेलन भी आयोजित हो ।

लेकिन ऐसे मंच पे कौन कवि प्रस्तुति देगा, उसका खयाल आयोजकों को रखना चाहिए । काव्य के नाम पे द्विअर्थी संवाद या हल्कापन एक कवि को शोभा नहीं देता । काव्य जब अंत्येष्ठ में उतरे तो चेहरे पे तेज आए, आयोजकों को यह सुनिश्चित करना चाहिये ।

शब्द ब्रह्म का पर्याय है, और कवि आराधक ।

 

Q. आपकी नजर में क्या यही एक कवि का धर्म है?

बिल्कुल । अगर कवि ही समाज को आइना नही दिखाएगा तो कौन संभालेगा इस उसका दारोमदार ।

Q. आप जब कविताएँ रचते हैं तो आपकी प्राथमिकताएं क्या होती हैं? अपने मनोभाव व्यक्त करना? या फिर आयोजक व श्रोता भी अपना प्रभाव रखते हैं?

नहीं, में केवल अपने मन की वृत्ति के अनुसार कागज़ रंगता हूँ । तालियों का व्यामोह सही नहीं है ।

 

Q. आपके कोई प्रिय कवि जिनकी पंक्तियाँ आप हमारे साथ सांझा करना चाहें

छुप छुप अश्र बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों,

कुछ अपनों के मर जाने से जीवन नही मरा करता ।

डूबे बिना नहाने वालों, बिना कफन मर जाने वालों,

लाख करे पतझड़ कोशिश पर उपवन नही मरा करता ।

जीवन नही मरा करता ।।

श्री भोपाल दास नीरज के व्यक्तित्व का में सदा से ही प्रशंशक रहा हूँ । गत वर्ष शरीर छोड़ गए लेकिन मेरे बहुत करीब थे ।