गुरु - एक कदम ईश्वर की ओर

ये मायावी संसार ने जब श्री कृष्ण को खोया

तब परम मित्र अर्जुन भी रोया

यहीं कहानी का प्रारंभ तो तब से हुआ

जब एकलव्य ने गुरूदक्षिना में अंगूठा कुरबान कर दिया।

 

गुरु की सेवा करना शिष्य का फर्ज है

विद्या के पथ पर आंधी सहज है

अगर ना कर पाए गुरु का आदर

तो तुम्हारी जीवन नैया तूफानी सागर का शिकार है।

 

शिष्य किरण तो गुरु किरणपुंज है

हमारे पुराणों में “ गुरु  देवो भव:” की गुंज है

अगर ना हो डूबता हुआ सूरज गगन में

तो खिलता हुआ चांद भी सितारा है।

 

ना है मजहब के बेदिया ना धन की उम्मीद है

बस कुछ कर जाने की जिद है

सीखने के लिए सुबह क्या शाम क्या

करोड़ों महान दिलों का यहीं तो पैगाम है।

 

दिलों में जज्बा हिमालय की चोटी पर है

भीतर आग मात्र विद्या की है

विद्यार्थी मान लो जलता दिया

तो जलता दिया आंधी का डर नहीं है।

 

आज शिक्षक दिन के पावन अवसर है

आज तो हरेक हिन्दुस्तानी की एक ही पुकार है

ना मिला गुरु का आशिष तो

पूरी ज़िंदगी सिर्फ सूखे पत्तों की सरसराहट है…….

सरसराहट है…..

सरसराहट है।