तस्वीर(हक़ीक़त)

जीवन की राह आसान नहीं,

मस्तिष्क में हो रहा घमासान है,

युद्ध कही थमा सा है,

या अभी अल्पविराम है।।

 

देवी पूजी जाती प्रतिदिन ,

मर्यादा का होता पल पल अपमान है,

आज भी सहारे पर चलती नारी,

कैसा स्त्री जाति का उत्थान है।।

 

मात-पिता की लाठी,

बनाती उनका  दूर मकान है,

भूखे पेट रहकर पाला जिसे,

भूखे मरने को छोड़ रही संतान है।।

 

अपनों संग रहते सब हैं,

अपनेपन से सब अनजान है,

कसमों में चांद तक ला कर देते,

मुश्किल में रोटी, कपड़ा और मकान है।।

 

राजा रंक हुआ अब तो,

रंक करता अब घमासान है,

अंत सबका निश्चित है फिर भी,

अहंकार में डूबता इंसान है।।

 

जल की गरिमा जाने सब,

गंदगी से होता रोज मिलान है,

पीने को भी मिलता नहीं कहीं,

कहीं बह रहा बन बेजुबान है।।

 

लोक लाज की पल पल बलि चढ़ी,

आधुनिकता में धूमिल होता सम्मान है,

समाज के लाखों चिंतक हैं,

आगे आने को लटकते सबके प्राण हैं।।

 

जीवन की राह आसान नहीं,

मस्तिष्क में हो रहा घमासान है,

युद्ध कही थमा सा है,

या अभी अल्पविराम है।।